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LIFE OF DEPRAVITY

DARK6VAMPIRE
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Synopsis
"They called him a monster. He proved them right." Nayra once challenged the Gods and lost. As the heavens crushed him, he used a stolen divine artifact, the Sudarshana Chakra, to reverse time and reset his life. Now reborn with the memories of a thousand years of war and 70 years of slavery, Nayra is done with heroism. He knows that in a world ruled by cruel deities, only the absolute wicked survive. From murdering his own parents to forge a weapon from their bones, to manipulating entire kingdoms into civil war, Nayra walks the path of Depravity. He doesn’t just defeat his enemies; he consumes their souls, devours their flesh, and turns their empires into ash. Awakening the forbidden powers of the Seven Princes of Hell, Nayra begins his climb from a lowly orphan to the Shadow King of the Imperial Underground. Gods beware. The real devil has returned.
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Chapter 1 - विनाश

स्वर्ण-प्रभा से फटा नभ धरती पर धधकता उतर रहा था। देवताओं की उपस्थिति भर से वायु कंपन करती, पर्वत काँच-से चटक कर बिखर जाते, और सागर उबलते भाप में उछल उठते।उस सर्वनाश के बीच— नायर अडिग खड़ा था।शरीर विदीर्ण, पर संकल्प अटूट।

एक दैवी भाला उसके वक्ष को भेदता है। माँस जलता है, अस्थि चटकती है, पर उसके होंठों पर रक्तभरी मुस्कान।देवों के घेरे के बीच वह अपने वक्ष में छिपे छठे चक्र के सर्पिल प्रकाश को कसकर पकड़ता है—चोरी किया हुआ सुदर्शन-प्रतिरूप।

"तू सीमा लाँघ चुका है," कोई रूपहीन देव गूँजता है।"पाँचवाँ चक्र मनुष्यों हेतु नहीं था— और तूने छठा भी खोल दिया।"

नायर की हँसी उसकी दग्ध छाती से बुलबुलों में फूटती है।वे काल से बँधे हैं। वह नहीं।

वह अंतिम श्वास में फुसफुसाता है—"प्रतिलोम।"

जगत् अन्धकार में चूर्ण होकर भस्म हो जाता है।

अगला क्षण—आर्द्र मिट्टी, धात्विक रक्त-गंध, और एक विलाप—उसका अपना।

नायर तैल-दीप की काँपती रोशनी में आँखें खोलता है।कच्ची लकड़ियों की दीवारें।उसकी माँ की भाषा के समान टूटता हुआ रुदन।नायर की स्मृतियाँ— अखंड।उसकी चेतना— हजार जन्मों का भार लेकर जीवित।

पहली श्वास ही उसके फुफ्फुसों को जलाती है।शरीर क्षीण, भंगुर, पर उसके भीतर वही पुराना, ठंडा मन।शिशु की असहायता— उसका सबसे घृणित चरण।

"सुन्दर है…"उसकी माता थकी आवाज़ में कहती है।पिता की कठोर उँगलियाँ उसकी सूक्ष्म उँगलियों को पकड़ती हैं—"यह अन्य बच्चों की भाँति अपने चक्र खोलेगा। बलवान बनेगा।"

नायर भीतर से केवल एक ही चीज़ देखता है—कच्चा पदार्थ। भविष्य का औजार।माता-पिता का प्रेम— उसके लिए उपयोग का प्रारम्भिक रूप।

उसका मन उसके भीतर फुसफुसाता है—हेड-स्लेयर कट्टर।एक निषिद्ध अस्त्र— जो धारण करने वाले की अपनी ही जन-अस्थियों से ढलता है।ऐसा शस्त्र जो देह नहीं, मन तोड़ता है।और उसे ढालने हेतु—अस्थियाँ चाहिए।

पर अभी नहीं।यह देह अकार्य है।प्रतीक्षा ही उसका पहला हथियार है।

रात के तूफ़ान में घर काँपता है।माता निद्रा में डूबी, पिता तलवार थामे झपकते हुए।नायर नहीं सोता।और तभी—वह उपस्थिति आती है।

देवताओं से परे, समय से परे।ना आकृति ना स्वर— केवल एक दबाव, जो अस्तित्व की तहें मोड़ दे।

विचार नहीं, पर विचार जैसा कुछ—उसके मन में सरकता है—

"तू अस्तित्व में रहना ही न चाहिए।"

नायर के नवजात होंठों पर एक विकृत मुस्कान।राक्षस-सी छाया।

देखते रहो।यह जीवन मेरा है।और इस चक्र— मैं तुम्हारी पकड़ से बाहर निकल जाऊँगा।

पिता चौंककर उठ बैठता है।"अभी जैसे… किसी की निगाह…"फिर सिर झटक देता है।"भ्रम ही होगा।"

वे कुछ नहीं जानते।पर भाग्य का पहिया इस रात थोड़ा-सा मुड़ चुका है।

चार वर्ष बीतते हैं।गाँव में बच्चों के चक्र जागने की आयु।माता-पिता उसे परीक्षण के लिए बैठाते हैं—आशा और भय के बीच काँपते हुए।

नायर आँखें मूँदता है।उसके भीतर ऊर्जा सर्पों की तरह कुण्डलित है—उग्र, जागृत।पर वह उसे कैद कर देता है।केवल शरीर को काँपने देता है।पसीने की एक बूँद टपकने देता है।

"मुझे… कुछ नहीं अनुभव हो रहा…"उसकी टूटी आवाज़ कमरे में ध्वनि बनती है।माता उसे गले लगा लेती है।पिता गहरी निःश्वास छोड़ता है।

और नायर?उसके भीतर ठंडी तृप्ति।

ज़ाबूज़ा अकादमी—जहाँ बच्चे औसत बनते हैं,और नायर— अदृश्य।

कक्षा में वह शब्द अटकाता है,डाँट पर काँपता है,भीड़ में गुम हो जाता है।शिक्षक उसे भूलने योग्य समझते हैं—और ठीक इसी में उसकी सुरक्षा है।

पर शाम को—वह मृत खेतों में अकेला होता है।छोटी मुट्ठियाँ हवा चीरती हैं,पैर धूल में गहरे चिह्न छोड़ते हैं।श्वास, गति, मन— सब अनुशासन में ढलते हैं।

अन्य शक्ति खोजते हैं।नायर धैर्य गढ़ता है।देवता भी जिस चीज़ से डरते हैं।

रक्ताभ सूर्यास्त में उसकी परछाईं लम्बी होती जाती है।हथेलियाँ घायल, पर मुट्ठियाँ कसकर बंधी।अस्थियाँ थरथराती हैं—पर उसकी दृष्टि स्थिर।

और भीतर एक शीतल सत्य—

मैंने दर्द को छोड़ा।आँसू बहाए— जब तक अर्थ खत्म न हो गया।शोक झेला— जब तक आत्मा कठोर न बन गई।हँसा— जब तक हँसी मुखौटा न बन गई।

अब?केवल धार शेष है।और धैर्य— जो संसार की रीढ़ तोड़ दे।

वह नहीं रुकता।रुकना— हार मानना है।और नायर…

कभी हार नहीं मानता।